शनिवार, 29 अप्रैल 2017

व्यक्तित्व सिद्धान्त

बहुत से मनोवैज्ञानिको ने अपने-अपने सिद्धान्त प्रतिपादित किये जिनमे से आज हम एक सिंद्धांत को आपके सामने प्रस्तुत करेंगे

"आज  हम हेनरी मर्रे के सिद्धांत को आपके सामने प्रस्तुत करेंगे जो इस प्रकार है।"

हेनरी मर्रे का सिद्धांत -: 
                                   व्यक्तित्व के कुछ सिद्धान्त ऐसे है जो यह मानते है कि प्रेरणा व्यक्ति में एक गत्यात्मक एवं निर्देशात्मक बल directing force होता है जो व्यक्ति को एक निश्चित व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है हेनरी मर्रे द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व का सिद्धांत जिसे व्यकितत्व का आवश्यकता सिद्धान्त कहा जाता है, एक ऐसा ही सिद्धान्त है। विशेष ढांचा जिसे उन्होंने personological system कहा है, के तहत उन्होंने व्यक्तित्व का एक सिद्धान्त विकसित किया है जिसे सारग्राही इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें हमे उन तथ्यों एवं cocepts की झलक मिलती है जिसे मर्रे ने अन्य सिद्धान्तों विशेषकर फ्रायड के व्यक्तित्व सिद्धान्त से लिया गया है। इस सिद्धांत को व्यकित्त्व का एक मौलिक सिद्धान्त इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें मर्रे के अपने विशेष concepts एवं विधि का वर्णन मिलता है जिसने कई महत्वपूर्ण शोधों को आमंत्रित भी किया है।

मर्रे द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के आवश्यकता सिद्धान्त में मानव व्यवहार के बारे में निम्नाकित पूर्वकल्पनाये की जाती है--

1-:   मानव प्रकृति निरर्ध्र्यता determinism विवेकी तथा समस्तिथि की पूर्वकल्पना पर गंभीर रूप से आधारित होता है।

2:- मानव प्रकृति पूर्णतावाद holism, अपरिवरत्नशीलता unchangeabililty, आत्मनिष्ठता तथा proactivity की पूर्वकल्पनाये से साधारण रूप से प्रभावित होताहै।

नोट-: पेरसोनोलॉजी एक ऐसा पद है जिसे मर्रे ने व्यक्तित्व की जगह पर अपने सिद्धान्त में प्रयोग किया था। ऐसे पेरसोनोलॉजी से उनका तातपर्य मनोविज्ञान की एक ऐसी शाखा से था जो व्यक्ति के जीवन एवं उसे प्रभावित करने वाली घटनाओ का अध्ययन करता है। **

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रविवार, 12 फ़रवरी 2017

thirst (प्यास)

आज  का टॉपिक है thirst  means प्याश। प्यास की स्तिथि क्यों उत्पन्न होती है तथा कैसे उत्पन्न होती है इसके क्या क्या करक है ये आपको इस ब्लॉग में बताया जायेगा तो आइए हम इसकी चर्चा करते है। 


प्यास :- शरीर के आतंरिक दशा को स्थिर बनाये रखने के लिए हमें समय - समय पर जल ग्रहण करना आवश्यक होता है। जल ग्रहण करने के शरीरक्रियात्मक नियंत्रण को जानने के पूर्व हमें शरीर के तरल प्रकोश्ठो को तथा इन  तरल भागो के आपसी सम्बद्ध को जानना आवश्यक है। 
शरीर में मुख्य रूप में चार प्रकार के प्रकोष्ठ होते है। 
अंतः कोशिकीय  का तरल प्रकोष्ठो तथा बाह्यकोशिकीय तरल के तीन प्रकोष्ठ होते है। 
शरीर में उपस्थित सम्पूर्ण जल का लगभग २/३ भाग अंतः कोशिकीय तरल में स्तिथ होता है। 
अर्थात कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में स्थित जल शेष जल बाह्यकोशिकीय तरल में उपस्तिथ होता है। 
बाह्यकोशिकीय तरल के तीन रूप है। 
1 :-अंतः वाहिका तरल या रक्तोद 
२ :-वल्कुटीय सुषुम्नीय द्रव 
3 :-अंतरकोशिकीय तरल 
ऐसा तरल जो दो कोशिकाओं के बीच उपस्थित होता है। यह ऐसा तरल है जिसमे कोशिकाएं स्तिथ होती है। शरीर के दो तरल प्रकोष्ठो को स्पस्ट सीमाओ के बीच रहना आवश्यक होता है।  अंतः कोशिकीय तरल का नियंत्रण बाह्य कोशिकीय तरल में उपस्थित विलेयों की सांद्रता से होता है.
सामन्यतः अंतरकोशिकीय तरल अंतः कोशिकीय तरल के साम्परासरी होता है। 
अर्थात अंतरकोशिकीय एवं अंतः कोशिकीय तरल में विलेयों की सांद्रता इस प्रकार संतुलित होती है।  की इन दोनों प्रकोष्ठो से जल न तो बाहर जा पाता है और न अंदर आ पाता है। 
अंतरकोशिकीय तरल से जल की हानि होती है अर्थात यदि यह जल अधिप्रासारि हो जाता है तब कोशिकाओं के अन्दर से जल बाहर खीच लिया जाता है। 
दूसरी तरफ यदि अंतरकोशिकीय तरल में अतिरिक्त जल आ जाता है।  अर्थात यदि यह कम सांद्र हो जाता है। 
तथा अधोपरासारी हो जाता है तब यह जल कोशिकाओं के अंदर प्रवेश करता है।   
ये दोनों स्तिथिया ही कोशिकाओं के लिए हानिकारक होती है। 
एक तरफ जल की हानि की दशा में कोशिकाएं कई रासायनिक क्रियाये नहीं कर पाती है। 
और दूसरी तरफ अधिक जल ग्रहण की दशा में इनके आवरण फट सकते है। 
अतः अंतरकोशिकीय तरल का अच्छी तरह नियमन होना अतिआवश्यक है।  
ह्रदय की यांत्रिक क्रियाविधि के लिए रक्तोद का भी अच्छा नियमन होना आवश्यक है। 
यदि रक्त का आयतन काफी कम हो जाये तब हृदय रक्त कप प्रभावशाली ढंग से पंप नही क्र सकता। यदि ऐसी दशा में रक्त आयतन पूर्व स्तिथि कोशीघ्र ही प्राप्त नही करता है। 
तब हृद लिपात  घटित हो सकता है। इस दशा को hypovolumia  कहते है। 
शरीर का वाहिका तंत्र इस दशा में  कुछ सहायता कर सकता है। 
छोटी शिराओ और धमनियों को और मांसपेशियों को संकुचित करके रक्त के कम आयतन की कुछ हद तक
भरपाई की जा सकती है। 

लेकिन ईस प्रकार के सुधार की भी कुछ सीमाएं है।
शरीर के तरल प्रकोष्ठों के दो विशेषताएं अंतरकोशिकिया तरल के विलेयो की सांद्रता तथा रक्त आयतन का नियमन दो भिन्न भिन्न संग्राहकों के समूह द्वारा किया जाता है । इस कार्य को एक प्रकार के संग्राहक से पूरा नही किया जा सकता रक्तस्राव के कारन रक्त आयतन में काफी कमी होती है। परन्तु इसका कोई स्पष्ट प्रभाव अंतरकोशिकिया तरल के आयतन पर नही पड़ता है। दूसरी तरफ नमकीन भोजन ग्रहण करने पर अंतरकोशिकिया तरल में विलेयो की सांद्रता बढ़ जाती है। और इससे कोशिका के अंदर स्तिथ जल बाहर आ जाता है। परन्तु इससे रक्त आयतन कम नही होता है। 


अतः जल हमारे शरीर में अतिआवश्यक है। 



बुधवार, 18 जनवरी 2017

स्व प्रत्यक्षीकरण

Self perception
1-समस्या
2-परिचय
3-परिकल्पना
4-परिक्षण सामग्री
5-प्रयोग विधि
6 छात्र का विवरण
7-निर्देश
8-प्रयोग प्रक्रिया
9-निष्कर्ष